Vande Mataram

Play to listen

त्राहि माम की लगी गुहार
जब पहुंची वह पहली बार

देवभूमि के इक छोटे गाँव
जहाँ धरा न अब तक पाँव

सत्तर साल से हाथ ने
बस लगा रहा उत्पात में

उस हाथ की छोटी ऊँगली
करती है खुद की ही चुगली

जब कहती है के दूर- दराज़
पहुंची बस संघ की आवाज़

करने उज्वल भारत भविष्य
अपना हित होगा अवश्य

उसके वचन बड़े अनमोल
अपने तराज़ू में दिया तोल

सबको उसने किया अवगत
निरंतर, निर्लज्ज, मिली-भगत

जो करे संस्कृति पर प्रहार
राष्ट्र गीत पर हाहाकार

पुत्र कुपुत्र भले हो जाए
‘कुमाता’, न होगी  माता , भाई

काल चक्र है घूम रहा
शताब्दियों तक बहुत सहा

होगी हर उस दिये की लौ मध्यम
सहसा सहमा दे जिसे वन्दे मातरम्

-@dimple_kaul

8 thoughts on “Vande Mataram”

  1. पुत्र कुपुत्र भले हो जाए
    ‘कुमाता’, न होगी माता , भाई

    काल चक्र है घूम रहा
    शताब्दियों तक बहुत सहा

    आदरणीय,आपका सार्थक प्रयोग कविता के साथ ,जो जीवन का सत्य बोलती है ,सुन्दर ! आभार “एकलव्य”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*